इन उलझनों के पार !

वो बचपन की धुंधलाई यादें, पुराने सन्दूक में जो दबी पड़ी थी,
वो यादें थी जिसमें खुशियाँ, वहीं पास में छिपी खड़ी थी।
उन यादों की उस गठरी से, एक भीनी सी खुशबू आती थी,
यह खुशबू जानी-पहचानी थी, कुछ लम्हें याद दिलाती थी।
वो लम्हें बचपन की बारिश के, जब खुशियाँ बरसा करती थी,
जब पास में रहने वाली गुड्डी, बाहर भीगने को तरसा करती थी।
बचपन में बारिश भी छोटी थी, एक हमउम्र सहेलीे जैसी थी,
वो काँच की खिड़कियों पर गिरती बूँदे, दिलचस्प पहेली जैसी थी।

वो सावन की पहली फुहार थी शायद, जब ऐसी खुशबू आई थी,
फिर अगली धुँआधार थी शायद, जब कागज़ की नाव चलाई थी।
‘वो बचपन की अमीरी थी साहब, जब अपने भी जहाज़ चला करते थे,
भले ही कागज़ के थे,नाज़ुक-छोटे थे, पर स्वच्छंद रूप से बहा करते थे।’
ना खो जाने का डर होता था, ना उनके डूब जाने का गम,
हाँ वो बचपन ही तो था, जब शायद ही आँखें होती थी नम।
अब उलझनों ने ऐसा घेरा है, कि पलकें गीली हो जाती हर बार,
क्या पता कब जा सकूँगा इन उलझनों के पार।

ज़्यादा समय नहीं बीता बचपन गुजरे, कल ही की बात लगती है,
मन छुड़ा ना पाए पीछा जिससे, वो ज़िद्दी सी याद लगती है।
बचपन बीता आई जवानी, पुरानी खत्म, शुरू अब नयी कहानी,
यह कहानी नहीं राजा-रानी की, ना प्यासे कौवे और पानी की।
यह नहीं कोई मनगढ़ंत किस्सा, जो गढ़ा हो मन बहलाने को,
यह संजीदा है, ख़ौफ़नाक है, यह काफी है दिल दहलाने को।
इसमें डर है थक कर गिर जाने का, अंधी दौड़ में पीछे रह जाने का,
खुद को साबित ना कर पाने का, गुमनामी में कहीं खो जाने का।

इसमें उलझनें हैं अपार, हर मोड़ खड़ी एक नई उलझन,
उम्मीदों के घने जंगल में, चट्टानों सी पड़ी एक नई उलझन।
उलझन बढ़ते रहने की, या सपनों का पीछा करने की,
उलझन बहुत कमाने की, या थोड़े में खुश हो जाने की।
किशोर ह्रदय के कोमल ऊतक, क्या सह पाएंगे इतना भार,

प्रौढ़ मानस की परिपक्वता ही बन पाएगी इसका आधार।
यह वक़्त भी बीत जाएगा, प्रचण्ड है इसकी रफ़्तार,
विश्वास रख अब चल पड़ा मैं, इन उलझनों के पार।

– अनभिज्ञ

This poem is about complexity of life which every person has to face at least once in his lifetime. These lines of poem is all about the inner thoughts of an adolescent. Here, the poet compares problems of his youth with happy moments of his childhood. I think this short description is enough for the reader to draw many other different meanings out of it by himself.

Please give your honest suggestions in the comment box below, your suggestions will help me to improve my writings. Thanks for visiting here. Happy Reading!

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13 thoughts on “इन उलझनों के पार !

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    1. Thanks so much sir for analysing my poem nd I’m glad that u identified the true meaning of it… Beauty of a poem always depends on the understanding of a reader..👍 Keep visiting.😊

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  1. Some Nostalgic moments painted on the blank canvas of Adolescents!
    The best thing I liked about this poetry is the beauty and realization of disengaged, liberal and free-spirited Childhood.
    The ongoing process of onerus, toilsome, melancholy Adulthood is described with real lines.
    But in the end, U go away with this fuss in HOPE. That’s gr8ly done!

    Again Fantastic Work!
    Keep it Up!
    Keep Writing!

    Liked by 1 person

    1. Thank you so much sir for reading my poem with so much interest. You always provide honest reviews which not only describes your understanding towards literature but also shows your keen interest in poetry. Thank you for contributing in my improvement. I also expect some critical reviews from your side in future.😊

      Like

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