शब्दकोष रिक्त है !

 

कहना है बहुत कुछ, पर शब्दों का अकाल है,
मन है विचलित, कुछ सोचता, ये कैसा जंजाल है।
भावनाएँ बह रही हैं, अविरल रफ़्तार से,
प्रतीत होता है कि जैसे आया भावों का भूचाल है।
मौन सा हुआ है मुख, पर अशांत चित्त है,
सोचता हूँ लिख लूँ कुछ, पर शब्दकोष रिक्त है।


लिखूँ तो लिखूँ, पर क्या लिखूँ ?
क्या सावन की बौछार लिखूँ, या शीत में पनपा प्यार लिखूँ,
पतझड़ की वीरानी लिखूँ, या वसंत में खिली रातरानी लिखूँ।
या लिख दूँ कोई राग जैसे मल्हार हो तानसेन की,
जिससे ज्येष्ठ की तपती रातें भी बन जाए सुख चैन की।
पर ये सब कुछ लिखना भी साहब इतना आसान नहीं होता है,
जो लिखता हूँ मैं बौछार का वर्णन, तो शीत का प्यार सुबकता है,
लिखने पर पतझड़ की बिरहें, वसंत का फूल दहकता है।
देख कर ये आपस का विग्रह, मन बड़ा भयभीत है,
सोचता हूँ लिख लूँ कुछ, पर शब्दकोष रिक्त है।

क्या कहते हो कोई कहानी लिखूँ? कोई पुरानी मगर जानी-पहचानी लिखूँ ,
कौरवों की हुंकार लिखूँ, या पांडवों की सत्य पुकार लिखूँ।
दुर्योधन का अभिमान लिखूँ, या जो मिला अर्जुन को वह ज्ञान लिखूँ।
या लिख दूँ फिर घटना कुरुक्षेत्र की, जहाँ हुआ था भीषण युद्ध-संग्राम,
या कर दूँ त्रासदी का वर्णन, जब हुआ अन्त में युद्ध-विराम।
पर लिखकर यह सारा वर्णन भी साहब कवि परेशान ही होता है,
क्योंकि जो लेता हूँ पक्ष कौरवों का, तो अन्याय पांडवो पर होता है,
पर देख दयालुता उस दानी कर्ण की, अचरज भी तो होता है।
भावों की इस भूलभुलैया में, फिर से खोता ये चित्त है,
सोचता हूँ लिख लूँ कुछ, पर शब्दकोष रिक्त है।

लिखने में क्या है ? कुछ भी लिख दूँ,
चाहूँ तो कृष्णलीला लिखूँ, गोकुल का हाल रंगीला लिखूँ ।
यशोदा का लाड़-प्यार लिखूँ, या देवकी की ममता अपार लिखूँ।
या लिख दूँ फिर वृन्दावन की होली, जिसमे जीवंत है प्रेम राधा-कृष्ण का,
‘यह प्रेम नहीं देह का विषय, यह तो सम्बन्ध है सीधा मन से अंतर्मन का।’
पर लिखकर यह सब कुछ भी साहब, कवि हँसता, फिर रोता है,
क्योंकि जो लिखता हूँ गोकुल का उत्सव, तो मथुरा एकांत में सिसकता है,
और जो तौल सके ममता यशोदा-देवकी की, कहो किसमें इतनी क्षमता है?
खुद को इस असमंजस में पाकर, कवि खोता अपना नैमित्त है,
सोचता हूँ लिख लूँ कुछ, पर शब्दकोष रिक्त है।

– अनभिज्ञ



This hindi poem describes the state of dilemma of a poet, and I think every writer has to face such situations at-least once in their writing career, when he is unable to think of a topic to write about. On one hand this poem shows his eagerness to write about anything while on the other hand it defines his inability to do so, as each topic has its own cons. Thus in the end he sums up the poem by saying that his glossary is vacant.

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21 thoughts on “शब्दकोष रिक्त है !

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  1. तुम्हारी पहली रचना है यह भाई!
    उस हिसाब से अत्यंत उत्तम है खासकर ये पंक्तियाँ
    मौन सा हुआ है मुख, पर अशांत चित्त है,
    सोचता हूँ लिख लूँ कुछ, पर शब्दकोष रिक्त है।
    बिलकुल हृदय में उतर गईं हैं

    Liked by 1 person

  2. Is Kavita Ko padkhar
    Tere vichaaro ki taarif ke liye
    Mera shabdkosh rikth hai

    Congratulations on your first post
    Keep writing…
    Keep inspiring…
    Many more such wonderful poems to come….

    Liked by 1 person

  3. Absolutely Amazing!!
    I have got the privilege to listen its rendition live!! Beautiful rendition dear!

    I even have its audio from U, and U wont believe but that is the part of my playlist.
    Few lines still spellbounds me….
    Wonderful piece!!
    Keep it up!
    Keep sharing (even with me at personal)!
    U have a long way to go!!

    Liked by 1 person

  4. बहुत खूब !!!! शब्दकोश रिक्त नहीँ है. बस आप जलेबी जैसी मीठी उलझन में है —
    क्या लिखूं , क्या ना लिखूं …..??

    Liked by 1 person

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