ख़ामोशी !

जब थक जाएँ पैर तुम्हारे, संघर्ष पथ पर चलते चलते, जब छा जाए हर ओर अँधेरा, डूब जाए सूरज ढलते ढलते। जब सही राह खो जाए, ना मिले सागर का कोई किनारा, जब तूफ़ान घेर लें सभी तरफ, ना हो पास में कोई सहारा। तब इन विपदाओं से हो भयभीत, ना करो मन को कमज़ोर सुनो,... Continue Reading →

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इन उलझनों के पार !

वो बचपन की धुंधलाई यादें, पुराने सन्दूक में जो दबी पड़ी थी, वो यादें थी जिसमें खुशियाँ, वहीं पास में छिपी खड़ी थी। उन यादों की उस गठरी से, एक भीनी सी खुशबू आती थी, यह खुशबू जानी-पहचानी थी, कुछ लम्हें याद दिलाती थी। वो लम्हें बचपन की बारिश के, जब खुशियाँ बरसा करती थी,... Continue Reading →

शब्दकोष रिक्त है !

  कहना है बहुत कुछ, पर शब्दों का अकाल है, मन है विचलित, कुछ सोचता, ये कैसा जंजाल है। भावनाएँ बह रही हैं, अविरल रफ़्तार से, प्रतीत होता है कि जैसे आया भावों का भूचाल है। मौन सा हुआ है मुख, पर अशांत चित्त है, सोचता हूँ लिख लूँ कुछ, पर शब्दकोष रिक्त है। लिखूँ... Continue Reading →

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